समाजशास्त्र की उतपत्ति एवं विकास

सभ्यता के आरम्भ से ही मानव उन समाजों घटनाओं एवं समूहों का अवलोकन तथा चिन्तन करता रहा है जिसमें वह रहता रहा है। फिर भी समाजशास्त्र एक आधुनिक विज्ञान और एक शताब्दी से अधिक पुराना नहीं है। ऑगस्त काम्टे ने स्वयं के विज्ञानों के ब्गीकरण में समाजशास्त्र को सबसे कम साधारण एवं अत्यधिक जटिल बताते हुए तार्किक और तेयिक रूप से दूसरे विज्ञानों के क्रम में बाद में रखा है। रॉबर्ट बीरस्टीड ने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक व्यवस्था’ (The Social Order) में लिखा है-“समाजशास्त्र का अतीत तो बहुत लम्बा है परन्तु इसका इतिहास संक्षिप्त।

सभ्यता के प्रारम्भ से ही समाज के साथ-साथ वह सभी घटनाएं जो उसके चंचल एवं जिज्ञास मस्तिष्क को आन्दोलित करती रही हैं, चिन्तन एवं अध्ययन का विषय रही हैं यह कहना निश्चित ही सही है कि पश्चिम में प्लेटो का ‘रिपब्लिक’ तथा पूर्व में कन्फ्यूशियस का एनालेक्टस’ समाजशास्त्रीय अन्यों में सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु समाज का अध्ययन पिछली एक शताब्दी में ही पृथक विषय तथा विज्ञान बन गया है । इस प्रकार स्पष्ट है कि “समाजशास्त्र आघुनिक विज्ञान है,परन्तु इसका अतीत बहुत लम्बा है। कोजर और रोजनबर्ग ने लिखा है- “सामाजिक दर्शन के अग्रदूत इतने ही प्राचीन है जितनी सभ्यता । अब हम समाजशास्त्रीय सिद्धांत के क्रमिक विकास का विवरण प्रस्तुत करेंगे।

प्रारम्भिक स्तर (Priman Stage) -पाश्चात्य धारण के अमुसार क्रमबद्ध समाजशास्त्रीय विचार का दार्शनिक विवेचन (मा से लगभग 400 पर पूर् दार्शनिक प्लेटो की पुस्तक The Republic’ (427-437 B.C) गोर अरस्तु की पुस्तको ‘हथपरा (Ethics) तथा पॉलिटिक्स’ समाज और व्यक्ति से सम्बन्धित अनेक पटनाओं का वर्णन उमलता है। परन्तु इन लेखकों का दृष्टिकोण विशेषत दार्शनिक रहा है । इसा राम्बन्ध में बीरस्टीय मालखा-सभी विज्ञान पहले विज्ञानों की महान जननी दर्शनशास्त्र के एक भाग पे और दर्शनशास्त्र इन सभी को अपने पीतर अभिन्न एवं अपपक रूप में समेटे गए था। पश्चिमी सभ्यता के विकास के साथ-साथ विभिन्न विद्वानों ने अपने आपको दर्शनशास्त्र से अलग कर लिया और अपने अपने पपक-पपक एवं स्वतन्त्र पावपक्रम को अपनाना आरप्भ पर दिया।

खगोल विज्ञान(Astronomy) तपा भौतिक विज्ञान इस प्रकार लगा होने वाले विज्ञानों में प्रथम थे, तत्पश्चात् रसायन शास्त्र, जीव विज्ञान एवं भूगर्भ शाख (Glory) ने उनका अनुसरन किया ।द्वितीय स्तर (Second Stage)-13वीं शताब्दी तक समाज तथा सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध में इसी प्रकार के विचार व कल्पनाएं चलती रहीं। यह युग बहुत कुछ सीमा तक धर्मान्धता का युग रहा है और मनुष्य जीवन का धार्मिक दृष्टि से ही विवेचन किया गया है। समाज में धर्म तथा जादू-टोने में अधिक विश्वास था। इस युग में एक ओर दर्शन तथा दूसरी ओर कल्पना पर अधिक विश्वास किया गया इसका एक फायदा यह हुआ कि अब सामाजिक घटनाओं के कार्य कारण सम्बन्ध को तार्किक आधार पर ढूंढने का प्रयास किया जाने लगा इस युग में यह विश्वास किया जाने लगा कि समाज एक गतिशील व्यवस्था है । समाज में जो परिवर्तन होते हैं वे कुछ निश्चित नियमों एवं सामाजिक और प्राकृतिक शक्तियों द्वारा होते हैं।

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