समाजशास्त्र जानकारिया एवं महत्वता

15वीं शताब्दी में समाज के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग आरम्भ हुआ,समाज की विभिन्न घटनाओं या सामाजिक घटनाओं के पक्षों का विशिष्ट तथा पृथक् अध्ययन आरम्भ हुआ। सम्भवतया इसी कारण अर्थशास्त्र राजनीतिशास्त्र. मनोविज्ञान, इतिहास आदि विज्ञानों की उत्पत्ति हुई । इन विभिन्न विशिष्ट विज्ञानों के विचारकों ने पी समाज तथा सामाजिक जीवन के सम्बन्ध में अपने विचारों को प्रकट किया। इस युग के प्रमुख विचारकों में मेशोविलि, सर थामस मूर, मान्टेस्क्यू, थामस हॉस,रूसो,मार्क आरेलियम आदि के नाम विशेष रूप से उलेखनीय है।समाजशास्त्र एक नए विज्ञान के रूप में प्राचीन काल से ही समाजशास्त्रीय अध्यपन किसी न किसी रूप में होते रहे हैं और उसके वैज्ञानिक अध्ययन की ओर भी विद्वानों का प्यान आकर्षित हुआ है।

19वीं शताब्दी में फ्रांसीसी दार्शनिक ऑगस्ट काम्टे ने समाज के अध्ययन की एक सामान्य पद्धति प्रस्तुत की। उनके अनुसार विज्ञान एक-दूसरे का एक निश्चित एवं तार्किक क्रम में अनुसरण करते है और सभी अन्वेषण वैज्ञानिक स्तर पर पहुंचने तक कुछ निश्चित अवस्थाओं से होकर गुजरते हैं। काम्टे के मतानुसार सामाजिक समस्याओं और सामाजिक पटनाओं से सम्बन्धित अन्वेषणों के लिए अब इस अन्तिम अवस्था पर आ जाने का समय आ गया है और इसीलिए उन्होंने यह सिफारिश की कि समाज के अध्ययन को समाज विज्ञान माना जाए।

इस प्रकार काम्टे ने एक नवीन सामाजिक विज्ञान की कल्पना की जिसका नाम इन्होंने पहले ‘सामाजिक भौतिक रखा और बाद में सन 1835 में बदलकर ‘Socialogy’ रखा। इसलिए काम को ‘समाजशास्त्र का पिता’ (Father of Sociology) कहा जाता है। जॉन स्टुअर्ट मिल ने इस नए विज्ञान के लिए ‘Ethology शब्द का सुझाव दिया था परन्तु यह नाम अन्य लेखकों को आकर्षित न कर सका। 19वीं शताब्दी के उत्तपर्दध में हर्बर्ट स्पेन्सर ने समाज के क्रमबद्ध अध्ययन का सूत्रपात किया और अपनी पुस्तक का शीर्षक समाजशास्त्र रखा। स्पेन्सर ने समाजशास्त्र को आगे बढ़ाने में काफी योगदान दिया।

बीसवीं शताब्दी में समाजशास्त्र का अधिक विकास हुआ। फ्रांस, जर्मनी तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में समाजशास्त्र का अधिक विकास हुआ। यद्यपि इन तीनों देशों में समाजशास्त्र के विकास की दिशाएँ भिन्न भिन्न रही है। काम्टे के बाद जॉन स्टुअर्ट मिल तथा स्पेन्सर ने समाजशास्त्र के विकास में सपनीय योग दिया यपपि ये दोनों विद्वान अंग्रेज थे परन्त फिर भी
इंग्लैण्ड में इसका विकास तीव्र गति से नहीं हुआ। ऑक्सफोर्ड तथा केम्बिज विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र का अध्ययन सन् 1960 में आरम्भ हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका में समाजशास्त्र कन-जीव गति से विकास हुआ। वहाँ पर सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों में इस विषय को पदाया जाता है तथा सभी में समाजशास्त्र का पथक विभाग है। अपनी शैशवावस्था में ही समाजशास्त्र ने बहुत अधिक विकास कर लिया है इसके विकास कार्य में प्रमुख विचारकों के नाम इस प्रकार से आते हैं।

फ्रांस-दुर्षीम, लिप्ले,रूसो, होलेकस,माउंटेन माउस आदि। जर्मनी-टानीज,तेजल,मार्क्स, हीगल,डिल्य,वीरकांत,जार्ज सिमेल तथा शैलर आदि। अमेरिका-विलियम बाह्य समनर, वार्ड, थॉमस, स्कूल, जैकी, गिडिग्स, पार्क बर्गेस, सोरोकिन,पारसन्स,मैकाइवर, आगवर्न तपा निमकॉफ, लुण्डबर्ग आदि। इंग्लैंड-हर्बर्ट स्पेन्सर, मिल, चार्ल्स बूच हॉब हाउस राबर्टसन, वेस्टरमार्क, गिन्सबर्ग, र्न मैनहिम आदि। इसके अतिरिक्त अन्य स्थानों पर पी समाजशास्त्र का उल्लेखनीय काम हुआ है एवं इस सम्बन्ध में प्रमुख कार्य हुए हैं। विश्व में अनेक विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र का अध्ययन तथा उससे सम्बन्धित अनुसंधान हो रहे हैं।

गत पचास वर्षों में समाजशास्त्र की प्रकृति में बहुत अधिक एवं तीव्रगति से परिवर्तन हुए हैं तो इसका वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण करके विज्ञान का रूप धारण कर लिया है। उपर्युक्त अध्ययन से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र एक नया विज्ञान है । रेडक्लिफ बाउन ने भी लिखा है कि,”मानव का विज्ञान अभी भी शैशवावस्था में है । बीरस्टीड का यह विचार सत्य ही प्रतीत होता है कि “समाजशास्त्र का कहानी उतनी ही पुरानी है जितना कि मानव विचार तथा इतना नवीन है जितना कि दैनिक- समाचार पत्र होता है।

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