समाजशास्त्र का अध्ययन-क्षेत्र /विषय-क्षेत्र

समाजशास्त्र की परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि समाजशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र को दो प्रकार का सार करने का प्रयत्न किया गया है-एक विचार पर यह है कि समाजशाल एक विशेष विज्ञान है। इस प्रकार समाजशास्त्र में केवल कुछ विशेष प्रकार के सम्बन्धों का हो अध्ययन किया जाना चाहिये। दूसरी विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है। इस प्रकार इसके अन्तर्गत सभी सामान्य सम्बन्यों का अध्ययन होना चाहिये। इन विचारधाराओं को हम क्रमशःस्वरूपात्मक और समन्वयात्मक सम्पदा के रूप में बाट सकते हैं। स्वरूपात्मक सम्प्रदाय-किस सम्प्रदाय के समर्थकों में सिमेल, पेचर, टानिज, वानविज,वीरकान्त आदि विद्वान हैं । इनका मत है कि समाजशास्त्र अभी एक नया विज्ञान है इस स्थिति में यदि हम इसे सम्पूर्ण समाज का एक सामान्य अध्ययन बताने की कोशिश करेंगे तो समाज का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करना बहुत कठिन हो जायेगा।

दूसरी बात यह है कि समाजशाल को एक स्वतंत्र विज्ञान बनाना आवश्यक है। ऐसा हम तभी कर सकते हैं जब समाजशास्त्र में केवल सामाजिक सम्बन्धों के एक विशेष पक्ष का ही अध्ययन किया जाय यदि हम समाजशास्त्र में सभी तरह के सामाजिक संबंधों का अध्ययन करने लगेंगे तब यह अनिवार्य रूप से दूसो सामाजिक विज्ञानों पर निर्भर बना रहेगा। स्वरूपात्मक सम्प्रदाय के इसी दृष्टिकोण को इनके समर्थकों ने पिन-भिन रूप से समझाने का प्रयास किया है। जॉर्ज सिमेल के विचार-प्रसिद्ध जर्मन समाजशास्त्र सिमेल का कथन है कि स्वतंत्र और विशेष विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र को केवल सामाजिक सम्बन्यों के स्वरूपों को विवेचना और विश्लेषण से ही संबंध होना चाहिए अपने कथन को स्पष्ट करने के लिए सिमेल ने सामाजिक सम्बन्यों के स्वरूप और अंतर्वस्तु में भेद किया है। उनका विचार है कि समा भौतिक व अभौतिक वस्तुओं का एक स्वरूप होता है और एक अन्तर्वस्तु।

उदाहरण के तो यदि हम एक मेज की लम्बाई,चौड़ाई और ऊंचाई को देखें तो यह उस मेज का स्वरूप होगा कि लेकिन यह मेज लकड़ो को बनी है या लोहे की या पत्थर की, यह विशेषता ठसकी अन्तर्वस्तु को स्पष्ट करें । ठीक इसी तरह सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूप और अन्तर्वस्तु को भी एक-दूसरे से अलग किया जा सकता है जैसे प्रतिस्पर्धा, अधीनता, सहयोग, प्रभुत्व, अनुकरण तथा श्रम विभाजन; सामाजिक सम्बन्यों के कुछ विशेष स्वरूप है, जबकि राजनीति, धर्म,दर्शन वपा । आर्थिक संघ सामाजिक सम्बन्धों की वह अन्तर्वस्तु है जिसमें स्वरूप विद्यमान रहते हैं यहीं पर समाजशास्त्र तथा दूसरे सामाजिक विज्ञानों के बीच अन्तर स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि दूसरे सामाजिक विज्ञान सामाजिक सम्बन्धों की अन्तर्वस्तु का अध्ययन करते हैं, जबकि समाजशास केवल सम्बन्यों के स्वरूप का अध्ययन करने तक ही सीमित है। सामाजिक सम्बन्यों के स्वरूप कुछ सम्बन्यों का एक विशेष भाग है, इसलिए समाजशास्त्र को भी एक विशेष विज्ञान की श्रेणी में रखना उचित होगा।

 

वीरकान्त के विचार ने भी समाजशास्त्र को एक विशेष सामाजिक विज्ञान बताते हुए इसे सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों का अध्ययन कहा है। उनके अनुसारसमाजशास्त्र उन मानासक सम्बन्यो जैसे यश प्रेम.पणा,सम्मान तथा समर्पण आदि का अध्ययन है जो व्यक्तियों को एक समूह से या एक-दूसरे से कांपते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र किसी विशेष समाज का एक ऐतिहासिक अध्ययन नहीं है। समाजशास्त्र केवल उन्हीं सम्बन्ध का अध्ययन करता है जो सामाजिक व्यवस्था को स्थायी बनाये रखते ह अपने सामाजिक व्यवस्पा में परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। इस अवधारणा के द्वारा वीरकान्त ने यह स्पष्ट किया है कि समाजशास्त्र को एक विशेष सीमा के बाहर जाना उचित नहीं है इसलिए समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है। मैक्स वेबर के विचार-वेबर के अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

दूसरे शब्दों में समाजशाल का ठदेश्य सामाजिक व्यवहारों को समझना पता उनकी व्याख्या करना है। वेबर के अनुसार सामाजिक व्यवहारों का तात्पर्य सभो सामाजिक सम्बन्यों से नहीं होता है, बल्कि सामाजिक व्यवहारों का निरिण केवल ठन्हीं सम्बन्तों से होता है जिन्हें सामाजिक क्रिया कहते हैं। सामाजिक क्रिया वे व्यवहार है जो अर्पूर्ण होते हैं और दसरे व्यक्तियों के व्यवहार से प्रभावित होते ह,समाजशाल में केवल उन्हीं सामाजिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है । वेबर का विचार है कि सामाजिक क्रियाओं के अध्ययन के द्वारा ही समाजशास्त्रीय नियमों को तार्किक और अनुभवसिद्ध बनाया जा सकता है। समाजमा यदि सभी तरह के सम्बन्धों का अध्ययन करने लगे तो इनके नियमों में तर्क और अनुभव का अभाव हो जाएगा। इस दृष्टिकोण से भी समज़सस्त्र एक विषय विज्ञान हैं।

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