समाजशास्त्र की उत्पत्ति या उद्भव के कारण

समाज के अध्ययन के लिए एक नवीन सामाजिक विज्ञान ‘समाजशास्त्र’ की उत्पत्ति या उद्भव 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में हुआ इसके उद्भव के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे। पूंजीवाद का प्रारम्भ-18वीं सदी के उत्तरा्द में सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ। समाज सामंतवादी व्यवस्था से पूंजीवादी व्यवस्था में प्रवेश कर गया। सन् 1789 की फ्रांस की क्रांति ने आम आदमी की विचारधारा में परिवर्तन का सूत्रपात किया। पहली बार स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व का विचार उभरकर सामने आया और लोग अपने अधिकारों के बारे में सजग होने लगे। औद्योगिक क्रांति-सन् 1800 में इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति ने सामाजिक परिवर्तन को तीव्र गति प्रदान की। बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई और सामाजिक व्यवस्था प्रदत्त से अर्जित में परिवर्तित होने लगी। सामन्तों और शासकों का आधिपत्य कम होने लगा व्यक्तिगत गुणों का महत्त्व बढ़ा।

नगरीकरण-उद्योगों की आवश्यकता को पूर्ति करने के लिए लोगों का गांव से औद्योगिक स्थापना स्थल की ओर प्रस्थान होने लगा। इससे नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई और लोग शहरों के भीड़ भरे वातावरण में रहने लगे एक नए प्रकार की सामाजिक व्यवस्था तथा सोच का विकास हुआ। संचार के साधनों में उन्नति-पूंजीवाद, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के परिणामस्वरूप संचार के साधनों में भी अपूर्व उन्नति होने लगी। नवीन सामाजिक समस्याओं का जन्म औद्योगीकरण,नगरीकरण अपने साथ नवीन सामाजिक समस्याओं को लेकर आए। मलिन बस्तियों बढ़ी और कारखाने के कामगारों के जीवन विपरीत रूप से प्रभावित हुए। परम्परागत व्यवसाय नष्ट हो गए।

यद्यपि समाज को नई सामाजिक संरचना बनी,लेकिन यह नवीन सामाजिक समस्याओं को जन्म लेने से नहीं रोक सकी। अध्ययन हेतु नवीन विषय की आवश्यकता उस समय हो रही समाज की पुल-पुल का व्यवस्थित रूप से अध्ययन करने के लिए एक ऐसे सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता महसूस है जो मनुष्य के विभिन्न गतिविधियों, परिवर्तनों तदा समस्या विषय के अन्तर्गत ही अध्ययन कर सके। इसी आवश्यकता की पूति के लिए सन 1838 में समज़सस्त्र की सथापना हुई

समाजशास्त्र की विषय -वस्तु समाजशास्त्र को विषय-वस्तु या विषय-साममो का उल्लेख निम्न प्रकार से किया जा सकता है। गिन्सबर्ग के अनुसार-प्रो. गिनसनर्ग ने समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में निम्न बातों के अप्पा पर बल दिया है। सामाजिक स्वरूप शास्त्र-इसमें समाज के आकार तपा स्वरूप को निरिचत करने वाली विशेषताओं,जैसे जनसंख्या के गुण एवं आकार का अध्ययन किया जाता है जो सामाजिक संरचना के निर्माण में योग देते हैं। सामाजिक नियंत्रण-इसके अन्तर्गत उन विषयों का अध्ययन किया जाता है जो सामाजिक जीवन को नियंत्रित एवं समाज के लोगों के व्यवहारों को व्यवस्थित बनाए रखने को दृष्टि से आवश्यक है । जैसे जनरीति, प्रथा, परम्परा,रूढ़ि,कानून, पर्म,नैतिकता एवं फेशन आदि। सामाजिक प्रक्रियाएँ-इसके अन्तर्गत व्यक्तियों एवं समूहों के बोच होने वाली विभिन्न अन्त क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है ये अन्तः क्रिया ही सामाजिक सम्बन्यों का आधार है जो सामाजिक प्रक्रिया के रूप में सदैव मौजूद रहती हैं इसके अन्तर्गत सहयोग प्रतिस्पर्धा संपर्क समायोजन,आत्मीकरण आदि का अध्ययन किया जाता है।

सामाजिक व्याधिकी-इसमें समाज को विपटित करने वाली या सामाजिक समस्याएं उत्पन करने वाली परिस्थितियों या दशाओं का अध्ययन किया जाता है। जैसे अपराष,बाल अपराध, निर्धनता,बेकारी आदि। दुर्खीम के विचार-टुख्खीम ने समाजशास्त्र की विषय-वस्तु में निम्न बातों को शामित किया है।सामाजिक स्वरूप शास्त्र-के अंतर्गत जीवन पर भौगोलिक कारकों के प्रभावो तथा सामाजिक संगठन के साथ उसके संबंधों का अध्ययन आता है। यहां जनसंख्या सम्बन्धी जाता है। समस्याओं जैसे जनसंख्या का आकार, घनत्व एवं स्थानीय वितरण आदि का भी अध्ययन किया जाता है।

सामाजिक शरीर सुख-इसमें समाज रूपी शरीर का निर्माण करने वाले विभिन्न अंगों जैसे धर्म,नीति, भाषा,कानून,परिवार आदि का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है। ये सभी विषय समाजशास्त्र को विभिन्न शाखाओं के रूप में विकसित हो चुके हैं। सामान्य समाजशास्त्र में सामाजिक तथ्यों के सामान्य रूप का पवा लगाने एवं उन सामान्य सामाजिक नियमों को ज्ञात करने पर जोर दिया जाता है जो सामाजिक जीवन को स्थिरता व निरन्तरता की दृष्टि से आवश्यक है या जिनका अन्य सामाजिक विज्ञानों के लिए भी विशेष महत्त्व है । दुर्खीम ने इस शाखा को समाजशास्त्र का दार्शनिक अंग कहा है।

You Might Also Like

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *