विज्ञान कर्मबन्द की परिभाषाये एवं परिचय

सोशियोलॉजी (Sociology) शब्द दो विभिन्न स्थानों क शब्दों के योग से बना है । इसका प्रथम शब्द सोशियस (Socius) है जो लैटिन भाषा से लिया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ ‘समाज (Society) है। द्वितीय शब्द लोगम (Logas) हे जो प्रोक भाषा से लिया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ शास्त्र अथवा विज्ञान (Science) ।। अत: समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ समाज का शाल अथवा समाज का विज्ञान है । इस प्रकार स्पष्ट होता है कि समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का क्रमबद्ध (Systematic) तथा संगठित अध्ययन करता है । हम समाजशास्त्र में समाज शब्द से आशय ‘मानव समाज’ से लगाते हैं। समाजशास्त्र मानव समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। किसी भी विषय का अध्ययन करने से पहले यह आवश्यक है कि उसकी परिभाषा की जाए। समाजशास्त्र एक नवीन विज्ञान है। समाजशास्त्रियों ने इसकी परिभाषा भिन्न भिन्न प्रकार से की है। सामान्यत सभी समाजशास्त्री यह मानते हैं कि समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है अथव समाज का अध्ययन है। फिर भी विभिन्न समाजशास्त्रियों ने समाजशास्त्र को भिन्न भिन्न प्रकार से सकता है। परिभाषित किया है।

समाजशास्त्र की परिभाषाओं को चार प्रमुख भागों में विभाजित किया है।समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में इस वर्ग के अन्तर्गत वे समाजशास्त्री आते हैं जिन्होंने समाजशास्त्र को समाज का विज्ञान माना है उनके अनुसार समाजशास्त्र सम्पूर्ण समाज का एक समग्र इकाई के रूप में क्रमबद्ध अध्ययन करता है इनमें वार्ड,गिडिम्स, ओडम आदि समाजशास्त्रियों के नाम प्रमुख है उन्होंने समाजशास्त्र की परिभाषा निम्न प्रकार दी है। वार्ड (Ward)-“समाजशास्त्र समाज का एक विज्ञान है। गिडिग्स (Giddings)- समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है । ओडम (Odum)-“समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।

ब्लैकमर तथा गिलिन (Blackmar and Gillin)-“समाजशास्त्र मानव जाति के सम्बन्ध से उत्पन्न समाज की घटनाओं का अध्ययन करता है। गिन्सबर्ग (Ginsberg)-“समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इस प्रकार पूर्वोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि समाजशास्त्र समाज का एक वैज्ञानिक अध्ययन है। समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में इस श्रेणी में मैकारवर तथा पेज,क्यूआर, आरनोल्ड एम. रोज आदि समाजशास्त्रियों के नाम प्रमुख रूप से लिये जाते हैं। इनके अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्यों का एक व्यवस्थित अध्ययन है समाजशास्त्र को इन समाजशास्त्रियों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है।

 

मैकईवर तथा पेज (Maciver R.M. and Page C.H.)- समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्यों के विषय में है तथा सम्बन्यौं के इस जाल को हम समाज कहते हैं। क्यबर (J.E.Cuber)- समाजशास्त्र को मानव सम्बन्धों के वैज्ञानिक ज्ञान के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। आरनोल्ड एम रोज (Arnold M. Rose)-“समाजशास्त्र मानव सम्बन्धों का विज्ञान है। इस प्रकार समाजशास्त्र को एक ऐसा विज्ञान माना जाता है जो सामाजिक सम्बन्धी का संक्षिप्त रूप में आप के समाज सामाजिक सम्बन्धों का जाति है। समाज में व्यक्ति मापनावस्यकताओं के प्रति के लिए परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्य स्थापित करताना अत:समाजशास्त्र में सामाजिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है।समाजशास्त्र सामाजिक अन्त क्रिया के अध्ययन के रूप में-गितिन वया   गिलिन,मित वेबर आदि समाजशास्त्रियों के अनुसार समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों के स्थान परवाज अन्तक्रियाओं का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि सामाजिक सम्बन्धों को संख्या बना आपक है कि उसका व्यवस्थित ओपन कर पाना अत्यन्त हो कठिन है।

इन्होने समाजशास्त्र की परिभाषा निम्न प्रकार से दी है। गीलिन तथा गीलीन (Gilin and Gillin)- व्यापक अर्थ में समाजशास्त्र व्यक्तियों के एकदूसरे के संपर्क में आने के परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली न्त क्रियाओं का अध्ययन कहा जा सकता है। जॉर्ज सिमेल (Gearg Sirmmmel)- “समाजशास् मानवीय अन्तःसम्बन्यों के स्वरूप विज्ञान है। मैक्स वेबर (Ma Weber)- समाजशास्त्र एक विज्ञान है। यह सामाजिक कार्यों की व्याख्या हुए इन को स्पष्ट करने का प्रयत्न करता है। इस विचारधारा से सम्बन्धित समाजशास्त्र की परिभाषाएँ यह स्पष्ट करती है कि सूजत समाज में होने वाली घटनाओं का अध्ययन नहीं करता वरन् समाजशास्त्र उन घटनाओं के सर्पों का अध्ययन करता है। सार है कि इस मव के मानने वाले समाजशास्त्री यह मानते है कि समाजशास्त्र में सामाजिक प्रक्रियाओं (Social Process) का अध्ययन किया जाता है।

समाजशास्त्र समूहों के अध्ययन के रूप में-सपा के अन्तति जॉनसन का नाम मुख्य रूप से लिया जाता है ये एक प्रख्यात समाजशास्त्री मे उन्हों समाजसास्त् को सामाजिक समूहों का अध्ययन माना है उनके अनुसार समाजशास्त्र की परिभाषा सामाजिक समूहों के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में की जानी चाहिए जब विभिन्न व्यक्ति परस्पर एक दूरे के सम्पर्क में आते हैं तो उनमें सामाजिक अन्त प्रत्यय होने लगती है और ये सामाजिक अन्तक्रियाएँ ही समूग का आधार बनती।। जॉनसन फा मत है कि इस प्रकार सामाजिक अनाजियाओं के आधार पर निर्मित होने वाले सामाजिक समूहों का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाता है। सामाजिक समूहों का अध्ययन लिए भी आवश्यक है क्योंकि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं अइच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए समूह में रहता है।

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